उत्तराखंड

ग्रामीणो की हुंकार सडक नही तो वोट नही

ग्रामीणो की हुंकार सडक नही तो वोट नहीं 

उत्तराखंड ,,सच्ची घटना 24 ✍️✍️✍️✍️✍️

पंडित जवेद साबिर ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

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हरिद्वार जिले की ज्वालापुर विधानसभा के खेड़ी शिकोहपुर गांव की मुख्य सड़क,, एक तरफ हम चांद पर आशियाना बसाने की बात करते हैं, दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दम भरते हैं और ‘डिजिटल इंडिया’ से लेकर ‘मेक इन इंडिया’ के नारे हर तरफ गूंज रहे हैं। लेकिन क्या यह चमक-धमक सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित है? आज हम आपको दिखाएंगे देवभूमि उत्तराखंड की वो कड़वी हकीकत, जो दावों की पोल खोल देगी। हरिद्वार के एक गांव में आजादी के दशकों बाद भी लोग कीचड़ में चलने को मजबूर हैं। अब ग्रामीणो का कहना है कि ‘सड़क नहीं, तो वोट नहीं’।”

तस्वीरों में दिख रहा यह कोई तालाब या गंदा नाला नहीं है, बल्कि यह हरिद्वार जिले की ज्वालापुर विधानसभा के खेड़ी शिकोहपुर गांव की मुख्य सड़क है। यह वही रास्ता है जो ग्रामीणों को तहसील और शहर से जोड़ता है। पिछले 30 सालों से इस सड़क की हालत जस की तस बनी हुई है। तीन दशक बीत गए, विधायक बदले, सरकारें बदलीं, सांसद बदले, लेकिन नहीं बदली तो इस सड़क की बदहाल तस्वीर।

ग्रामीणों ने विकास की उम्मीद में कभी कांग्रेस को चुना तो कभी भाजपा की ‘डबल इंजन’ सरकार पर भरोसा जताया। पूर्व सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने इस गांव को दो बार गोद भी लिया, लेकिन ‘गोद’ लिए गए गांव की किस्मत आज भी अनाथ सी नजर आती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पूरे उत्तराखंड को ‘गड्ढा मुक्त’ करने का संकल्प लिया था, लेकिन खेड़ी शिकोहपुर के इन गड्ढों ने सरकार के दावों की कमर तोड़ दी है। ग्रामीणो का कहना है कि 30 साल हो गए हमें इस नरक में रहते हुए। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, बीमार अस्पताल पहुँचने से पहले दम तोड़ देते हैं। विधायक और सांसद सिर्फ चुनाव में हाथ जोड़ने आते हैं। इस बार हमने तय कर लिया है- रोड नहीं, तो वोट नहीं।

 

गुस्साए ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे चुका है। सड़क पर उतरे गांव वालों ने स्थानीय विधायक रवि बहादुर और सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। “सांसद त्रिवेंद्र खेड़ी आओ” और “सी एम धामी इधर भी ध्यान दो” के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे हों या लाठी टेकते बुजुर्ग, हर किसी को इस जानलेवा कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है। आए दिन होने वाले हादसों ने अब ग्रामीणों को आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया है।

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