इतिहास के पन्नों में दफन होगी साबिर पाक की परंपरा, घंटे की गूंज बंन्द, लंगर का वक्त बदला… क्या मिट रही है सदियों पुरानी रूहानियत

इतिहास के पन्नों में दफन होगी साबिर पाक की परंपरा, घंटे की गूंज बंन्द, लंगर का वक्त बदला… क्या मिट रही है सदियों पुरानी रूहानियत,,

उत्तराखंड,, सच्ची घटना 24 न्यूज़ ✍️ ✍️ ✍️
पंडित ,,जावेद साबिर कलियर ✍️ ✍️ ✍️
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पिरान कलियर विश्व प्रसिद्ध दरगाह साबिर पाक ,,घंटा खामोश: साबिर पाक की पहचान पर सवाल,, लंगर का टाइम टेबल गायब: अकीदतमंद भटक रहें,,सदियों पुरानी परंपरा पर लगा ताला लगा,, जवाल का घंटा नहीं, अनुशासन भी नहीं,,उर्स की धरती पर विरासत की सिसकियां,, खादिम बोले: पहले वाली साबिर पाक में अब परंपरा नहीं रही,,आस्था या अव्यवस्था: कौन जिम्मेदार,,,रूहानी विरासत बेच दी या बचा ली जाएगी,,
इतिहास के पन्नों में दफन होगी साबिर पाक की परंपरा,
पिरान कलियर की सरजमीं… जहां सदियों से मोहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम गूंजता है। हज़रत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह… लेकिन आज उसी दरगाह से एक ऐसी खबर आ रही है जिसने हर अकीदतमंद का दिल हिला दिया है। वो घंटा जो वक्त बताता था, वो अब खामोश है। और वो लंगर जो अनुशासन से बंटता था, उसका कोई वक्त ही नहीं रहा। सवाल एक ही है: क्या साबिर पाक की रूहानी विरासत को बचाने के लिए कोई है दरगाह का गेट, खाली जगह जहां घंटा लटका था, लंगरखाना,एक समय था जब यह पीतल का विशाल घंटा चौबीसों घंटे बोलता था। लकड़ी के डंडे से बजता ये घंटा सिर्फ समय नहीं बताता था। ये दरगाह के अनुशासन की आवाज थी। दोपहर 11:45 बजे जवाल के वक्त ये बजता… और लंगर शुरू हो जाता। मगरिब की नमाज़ के बाद फिर बजता… और फिर हजारों भूखों का पेट भरता।लेकिन आज स्थानीय लोग और पुराने खादिम कहते हैं, न वो घंटा सुनाई देता है, न लंगर का कोई तय वक्त ,पहले 11:45 पर घंटा बजता था, सबको पता था लंगर का टाइम है। अब कभी 10 बजे, कभी 5 बजे। बुजुर्ग लोग घंटों इंतजार करते हैं। ये कैसी व्यवस्था है। ये सिर्फ घंटा और लंगर की बात नहीं है। लोगों का कहना है दरगाह की कई ऐतिहासिक रस्में धीरे-धीरे बदल रही हैं या खत्म हो रही हैं। बिना किसी सूचना के बिना किसी सफाई के। करोड़ों अकीदतमंदों के लिए साबिर पाक की दरगाह सिर्फ एक इमारत नहीं है। ये एक जीवंत विरासत है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरा है। क्या दरगाह प्रशासन इस अमूल्य धरोहर का दस्तावेजीकरण करेगा क्या वो अनुशासन फिर लौटेगा या फिर हम चुपचाप देखेंगे कि साबिर पाक की रूहानियत इतिहास की किताबों तक सिमट कर रह जाएगी।



